Text of Prime Minister’s “ Mann Ki Baat ” programme on All India Radio

By | November 29, 2015
Prime Minister’s Office of Govt of India on 29-November, 2015
Text of Prime Minister’s “ Mann Ki Baat ” programme on All India Radio

प्यारे देशवासियो, नमस्ते।

दीपावली के पावन पर्व के दरम्यान आपने छुट्टियाँ बहुत अच्छे ढंग से मनायी होंगी। कहीं जाने का अवसर भी मिला होगा। और नए उमंग-उत्साह के साथ व्यापार रोज़गार भी प्रारंभ हो गए होंगे। दूसरी ओर क्रिसमस की तैयारियाँ भी शुरू हो गयी होंगी। समाज जीवन में उत्सव का अपना एक महत्त्व होता है। कभी उत्सव घाव भरने के लिये काम आते हैं, तो कभी उत्सव नई ऊर्ज़ा देते हैं। लेकिन कभी-कभी उत्सव के इस समय में जब संकट आ जाए तो ज्यादा पीड़ादायक हो जाता है, और पीड़ादायक लगता है। दुनिया के हर कोने में से लगातार प्राकृतिक आपदा की ख़बरें आया ही करती हैं। और न कभी सुना हो और न कभी सोचा हो, ऐसी-ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की ख़बरें आती रहती हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कितना तेजी से बढ़ रहा है यह अब हम लोग अनुभव कर रहे हैं। हमारे ही देश में, पिछले दिनों जिस प्रकार से अति वर्षा और वो भी बेमौसमी वर्षा और लम्बे अरसे तक वर्षा, ख़ासकर के तमिलनाडु में जो नुकसान हुआ है, और राज्यों को भी इसका असर हुआ है। कई लोगों की जानें गयीं। मैं इस संकट की घड़ी में उन सभी परिवारों के प्रति अपनी शोक-संवेदना प्रकट करता हूँ। राज्य सरकारें राहत और बचाव कार्यों में पूरी शक्ति से जुट जाती हैं। केंद्र सरकार भी हमेशा कंधे से कन्धा मिलाकर काम करती है। अभी भारत सरकार की एक टीम तमिलनाडु गयी हुई है। लेकिन मुझे विश्वास है तमिलनाडु की शक्ति पर इस संकट के बावज़ूद भी वो फ़िर एक बार बहुत तेज़ गति से आगे बढ़ने लग जाएगा। और देश को आगे बढ़ाने में जो उसकी भूमिका है वो निभाता रहेगा।

लेकिन जब ये चारों तरफ़ संकटों की बातें देखते हैं तो हमें इसमें काफी बदलाव लाने की आवश्यकता हो गयी है। आज से 15 साल पहले प्राकृतिक आपदा एक कृषि विभाग का हिस्सा हुआ करता था, क्योंकि तब ज़्यादा से ज़्यादा प्राकृतिक आपदाएँ यानि अकाल यहीं तक सीमित था। आज तो इसका रूप ही बदल गया है। हर level पे हमें अपनी Capacity Building के लिए काम करना बहुत अनिवार्य हो गया है। सरकारों ने civil society ने, नागरिकों ने, हर छोटी-मोटी संस्थाओं ने बहुत वैज्ञानिक तरीके से Capacity Building के लिए काम करना ही पड़ेगा। नेपाल के भूकंप के बाद मैंने पकिस्तान के प्रधानमंत्री श्रीमान नवाज़ शरीफ़ से बात की थी। और मैंने उनसे एक सुझाव दिया था कि हम SAARC देशों ने मिल करके Disaster Preparedness के लिए एक joint exercise करना चाहिये। मुझे खुशी है कि SAARC देशों के एक table talk exercise और best practices का seminar workshop दिल्ली में संपन्न हुआ। एक अच्छी शुरुआत हुई है।

मुझे आज पंजाब के जलंधर से लखविंदर सिंह का phone मिला है। ‘मैं लखविंदर सिंह, पंजाब जिला जलंधर से बोल रहा हूँ। हम यहाँ पर जैविक खेती करते हैं और काफी लोगों को खेती के बारे में guide भी करते हैं। मेरा एक सवाल है कि जो ये खेतों को लोग आग लगाते हैं, पुआल को या गेहूँ के झाड़ को कैसे इनको लोगों को guide किया जाए कि धरती माँ को जो सूक्ष्म जीवाणु हैं, उन पर कितना खराब कर रहे हैं और जो ये प्रदूषण हो रहा है दिल्ली में, हरियाणा में, पंजाब में इससे कैसे राहत मिले।” लखविंदर सिंह जी मुझे बहुत खुशी हुई आपके सन्देश सुन करके। एक तो आनंद इस बात का हुआ कि आप जैविक खेती करने वाले किसान हैं। और स्वयं जैविक खेती करते हैं ये इतना ही नहीं आप किसानों की समस्या को भली-भाँति समझते हैं। और आपकी चिंता सही है लेकिन ये सिर्फ़ पंजाब, हरियाणा में ही होता है ऐसा नहीं है। पूरे हिन्दुस्तान में ये हम लोगों की आदत है और परंपरागत रूप से हम इसी प्रकार से अपने फसल के अवशेषों को जलाने के रास्ते पर चल पड़ते हैं। एक तो पहले नुकसान का अंदाज़ नहीं था। सब करते हैं इसलिए हम करते हैं वो ही आदत थी। दूसरा, उपाय क्या होते हैं उसका भी प्रशिक्षण नहीं हुआ। और उसके कारण ये चलता ही गया, बढ़ता ही गया और आज जो जलवायु परिवर्तन का संकट है, उसमें वो जुड़ता गया। और जब इस संकट का प्रभाव शहरों की ओर आने लगा तो ज़रा आवाज़ भी सुनाई देने लगी। लेकिन आपने जो दर्द व्यक्त किया है वो सही है। सबसे पहला तो उपाय है हमें हमारे किसान भाइयो-बहनों को प्रशिक्षित करना पड़ेगा उनको सत्य समझाना पड़ेगा कि फसल के अवशेष जलाने से हो सकता है समय बचता होगा, मेहनत बचती होगी। अगली फसल के लिए खेत तैयार हो जाता होगा। लेकिन ये सच्चाई नहीं है। फसल के अवशेष भी बहुत कीमती होते हैं। वे अपने आप में वो एक जैविक खाद होता है। हम उसको बर्बाद करते हैं। इतना ही नहीं है अगर उसको छोटे-छोटे टुकड़े कर दिये जाएँ तो वो पशुओं के लिए तो dry-fruit बन जाता है। दूसरा ये जलाने के कारण ज़मीन की जो ऊपरी परत होती है वो जल जाती है।

मेरे किसान भाई-बहन पल भर के लिये ये सोचिए कि हमारी हड्डियाँ मज़बूत हों, हमारा ह्रदय मज़बूत हो, kidney अच्छी हो, सब कुछ हो लेकिन अगर शरीर के ऊपर की चमड़ी जल जाए तो क्या होगा? हम जिन्दा बच पायेंगे क्या? हृदय साबुत होगा तो भी जिन्दा नहीं बच पायेंगे। जैसे शरीर की हमारी चमड़ी जल जाए तो जीना मुश्किल हो जाता है। वैसे ही, ये फसल के अवशेष ठूंठ जलाने से सिर्फ़ ठूंठ नहीं जलते, ये पृथ्वी माता की चमड़ी जल जाती है। हमारी जमीन के ऊपर की परत जल जाती है, जो हमारे उर्वरा भूमि को मृत्यु की ओर धकेल देती है। और इसलिए उसके सकारात्मक प्रयास करने चाहिए। इस ठूंठ को फिर से एक बार ज़मीन में दबोच दिया, तो भी वो खाद बन जाता है। या अगर किसी गड्ढे में ढेर करके केंचुए डालकर के थोड़ा पानी डाल दिया तो उत्तम प्रकार का जैविक खाद बन करके आ जाता है। पशु के खाने के काम तो आता ही आता है, और हमारी ज़मीन बचती है इतना ही नहीं, उस ज़मीन में तैयार हुआ खाद उसमें डाला जाए, तो वो double फायदा देती है।

मुझे एक बार केले की खेती करने वाले किसान भाइयों से बातचीत करने का मौका मिला। और उन्होंने मुझे एक बड़ा अच्छा अनुभव बताया। पहले वो जब केले की खेती करते थे और जब केले की फसल समाप्त होती थी तो केले के जो ठूंठ रहते थे, उसको साफ़ करने के लिए प्रति hectare कभी-कभी उनको 5 हज़ार, 10 हज़ार, 15 हज़ार रूपये का खर्च करना पड़ता था। और जब तक उसको उठाने वाले लोग ट्रैक्टर-वैक्टर लेकर आते नहीं तब तक वो ऐसे ही खड़ा रहता था। लेकिन कुछ किसानों ने prove किया उस ठूंठ के ही 6—6, 8-8 inch के टुकड़े किये और उसको ज़मीन में गाड़ दिए। तो अनुभव ये आया इस केले के ठूंठ में इतना पानी होता है कि जहाँ उसको गाड़ दिया जाता है, वहाँ अगर कोई पेड़ है, कोई पौधा है, कोई फसल है तो तीन महीने तक बाहर के पाने की ज़रुरत नहीं पड़ती। वो ठूंठ में जो पानी है, वही पानी फसल को जिन्दा रखता है। और आज़ तो उनके ठूंठ भी बड़े कीमती हो गए हैं। उनके ठूंठ में से ही उनको आय होने लगी है। जो पहले ठूंठ की सफ़ाई का खर्चा करना पड़ता था, आज वो ठूंठ की मांग बढ़ गयी है। छोटा सा प्रयोग भी कितना बड़ा फायदा कर सकता है, ये तो हमारे किसान भाई किसी भी वैज्ञानिक से कम नहीं हैं।

प्यारे देशवासियो आगामी 3 दिसम्बर को ‘International Day of Persons with Disabilities’ पूरा विश्व याद करेगा। पिछली बार ‘मन की बात’ में मैंने ‘Organ Donation’ पर चर्चा की थी। ‘Organ Donation’ के लिए मैंने NOTO के helpline की भी चर्चा की थी और मुझे बताया गया कि मन की उस बात के बाद phone calls में क़रीब 7 गुना वृद्धि हो गयी। और website पर ढाई गुना वृद्धि हो गयी। 27 नवम्बर को ‘Indian Organ Donation Day’ के रूप में मनाया गया। समाज के कई नामी व्यक्तियों ने हिस्सा लिया। फिल्म अभिनेत्री रवीना टंडन सहित, बहुत नामी लोग इससे जुड़े। ‘Organ Donation’ मूल्यवान जिंदगियों को बचा सकता है। ‘अंगदान’ एक प्रकार से अमरता ले करके आ जाता है। एक शरीर से दूसरे शरीर में जब अंग जाता है तो उस अंग को नया जीवन मिल जाता है लेकिन उस जीवन को नयी ज़िंदगी मिल जाती है। इससे बड़ा सर्वोत्तम दान और क्या हो सकता है। Transplant के लिए इंतज़ार कर रहे मरीज़ों, organ donors, organ transplantation की एक national registry 27 नवम्बर को launch कर दी गयी है। NOTO का logo, donor card और slogan design करने के लिए ‘mygov.in’ के द्वारा एक national competition रखी गयी और मेरे लिए ताज्ज़ुब था कि इतने लोगों इतना हिस्सा लिया, इतने innovative way में और बड़ी संवेदना के साथ बातें बताईं। मुझे विश्वास है कि इस क्षेत्र पर भी व्यापक जागरूकता बढ़ेगी और सच्चे अर्थ में जरूरतमंद को उत्तम से उत्तम मदद मिलेगी, क्योंकि ये मदद कहीं से और से नहीं मिल सकती जब तक कि कोई दान न करे।

जैसे मैंने पहले बताया 3 दिसम्बर विकलांग दिवस के रूप में मनाया जाता है। शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग वे भी एक अप्रतिम साहस और सामर्थ्य के धनी होते हैं। कभी-कभी पीड़ा तब होती है जब कहीं कभी उनका उपहास हो जाता है। कभी-कभार करुणा और दया का भाव प्रकट किया जाता है। लेकिन अगर हम हमारी दृष्टि बदलें, उनकी ओर देखने का नज़रिया बदलें तो ये लोग हमें जीने की प्रेरणा दे सकते हैं। कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दे सकते हैं। हम छोटी सी भी मुसीबत आ जाए तो रोने के लिए बैठ जाते हैं। तब याद आता है कि मेरा तो संकट बहुत छोटा है, ये कैसे गुजारा करता है? ये कैसे जीता है? कैसे काम करता है? और इसलिए ये सब हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनकी संकल्प शक्ति, उनका जीवन के साथ जूझने का तरीका और संकट को भी सामर्थ्य में परिवर्तित कर देने की उनकी ललक काबिले-दाद होती है।

जावेद अहमद, मैं आज उनकी बात बताना चाहता हूँ। 40–42 साल की उम्र है। 1996 कश्मीर में, जावेद अहमद को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। वे आतंकियों के शिकार हो गए, लेकिन बच गए। लेकिन, आतंकवादियों की गोलियों के कारण kidney गँवा दी। Intestine और आँत का एक हिस्सा खो दिया। serious nature की spinal injury हो गयी। अपने पैरों पर खड़े होने का सामर्थ्य हमेशा-हमेशा के लिए चला गया, लेकिन जावेद अहमद ने हार नहीं मानी। आतंकवाद की चोट भी उनको चित्त नहीं कर पायी। उनका अपना जज़्बा, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है बिना कारण एक निर्दोष इंसान को इतनी बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ी हो, जवानी खतरे में पड़ गयी हो लेकिन न कोई आक्रोश, न कोई रोष इस संकट को भी जावेद अहमद ने संवेदना में बदल दिया। उन्होंने अपने जीवन को समाजसेवा में अर्पित कर दिया। शरीर साथ नहीं देता है लेकिन 20 साल से वे बच्चों की पढ़ाई में डूब गए हैं। शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए infrastructure में सुधार कैसे आएँ? सार्वजनिक स्थानों पर, सरकारी दफ्तरों में विकलांग के लिए व्यवस्थाएँ कैसे विकसित की जाएँ? उस पर वो काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी पढ़ाई भी उसी दिशा में ढाल दी। उन्होंने social work में Master Degree ले ली और एक समाजसेवक के रूप में एक जागरूक नागरिक के नाते विकलांगों के मसीहा बन कर के वे आज एक silent revolution कर रहे है। क्या जावेद का जीवन हिंदुस्तान के हर कोने में हमे प्रेरणा देने के लिए काफ़ी नहीं है क्या? मैं जावेद अहमद के जीवन को, उनकी इस तपस्या को और उनके समर्पण को 3 दिसम्बर को विशेष रूप से याद करता हूँ। समय अभाव में मैं भले ही जावेद की बात कर रहा हूँ लेकिन हिंदुस्तान के हर कोने में ऐसे प्रेरणा के दीप जल रहे हैं। जीने की नई रोशनी दे रहे हैं, रास्ता दिखा रहे हैं। 3 दिसम्बर ऐसे सब हर किसी को याद कर के उनसे प्रेरणा पाने का अवसर है।

हमारा देश इतना विशाल है। बहुत-सी बातें होती हैं जिसमें हम सरकारों पर dependent होते हैं। मध्यम-वर्ग का व्यक्ति हो, निम्न-मध्यम वर्ग का व्यक्ति हो, गरीब हो, दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित उनके लिए तो सरकार के साथ सरकारी व्यवस्थाओं के साथ लगातार संबंध आता है। और एक नागरिक के नाते जीवन में कभी न कभी तो किसी न किसी सरकारी बाबू से बुरा अनुभव आता ही आता है। और वो एकाध बुरा अनुभव जीवन भर हमें सरकारी व्यवस्था के प्रति देखने का हमारा नज़रिया बदल देता है। उसमें सच्चाई भी है लेकिन कभी-कभी इसी सरकार में बैठे हुए लाखों लोग सेवा-भाव से, समर्पण-भाव से, ऐसे उत्तम काम करते हैं जो कभी हमारी नज़र में नहीं आते। कभी हमें पता भी नहीं होता है, क्योंकि इतना सहज होता है हमें पता ही नहीं होता है कि कोई सरकारी व्यवस्था, कोई सरकारी मुलाज़िम ये काम कर रहा है।

हमारे देश में ASHA Workers जो पूरे देश में network है। हम भारत के लोगों के बीच में कभी-कभी ASHA Workers के संबंध में चर्चा न मैंने सुनी है न आपने सुनी होगी। लेकिन मुझे जब बिलगेट्स फाउंडेशन के विश्व प्रसिद्ध परिवार entrepreneur के रूप में दुनिया में उनकी सफलता एक मिसाल बन चुकी है।ऐसे बिलगेट्स और मिलिंडागेट्स उन दोनों को हमने joint पद्म विभूषण दिया था पिछली बार। वे भारत में बहुत सामाजिक काम करते हैं। उनका अपना निवृत्ति का समय और जीवन भर जो कुछ भी कमाया है गरीबों के लिए काम करने में खपा रहे हैं।वे जब भी आते हैं, मिलते हैं और जिन-जिन ASHA Workers के साथ उनको काम करने का अवसर मिला है, उनकी इतनी तारीफ़ करते हैं, इतनी तारीफ़ करते हैं, और उनके पास कहने के लिए इतना होता है कि ये आशा-वर्कर को क्या समर्पण है कितनी मेहनत करते है। नया-नया सीखने के लिए कितना उत्साह होता है। ये सारी बातें वो बताते हैं। पिछले दिनों उड़ीसा गवर्नमेंट ने एक ASHA Worker का स्वतंत्रता दिवस पर विशेष सम्मान किया। उड़ीसा के बालासोर ज़िले का एक छोटा सा गाँव तेंदागाँव एक आशा-कार्यकर्ता और वहाँ की सारी जनसंख्या शिड्यूल-ट्राइब की है। अनुसूचित-जनजातियों के वहाँ लोग हैं, ग़रीबी है। और मलेरिया से प्रभावित क्षेत्र है। और इस गाँव की एक आशा-वर्कर “जमुना मणिसिंह” उसने ठान ली कि अब मैं इस तेंदागाँव में मलेरिया से किसी को मरने नहीं दूँगी। वो घर-घर जाना छोटे सा भी बुखार की ख़बर आ जाए तो पहुँच जाना।उसको जो प्राथमिक व्यवस्थायें सिखाई गई हैं उसके आधार पर उपचार के लिए लग जाना। हर घर कीटनाशक मच्छरदानी का उपयोग करे उस पर बल देना। जैसे अपना ही बच्चा ठीक से सो जाये और जितनी केयर करनी चाहिए वैसी ASHA Worker “जमुना मणिसिंह” पूरा गाँव मच्छरों से बच के रहे इसके लिए पूरे समर्पण भाव से काम करती रहती हैं। और उसने मलेरिया से मुकाबला किया, पूरे गाँव को मुकाबला करने के लिए तैयार किया।ऐसे तो कितनी “जमुना मणि” होंगी। कितने लाखों लोग होंगे जो हमारे अगल-बगल में होंगे। हम थोड़ा सा उनकी तरफ़ एक आदर भाव से देखेंगे।ऐसे लोग हमारे देश की कितनी बड़ी ताकत बन जाते हैं। समाज के सुख-दुख के कैसे बड़े साथी बन जाते हैं। मैं ऐसे सभी ASHA Workers को “जमुना मणि” के माध्यम से उनका गौरवगान करता हूँ।

मेरे प्यारे नौजवान मित्रो, मैंने ख़ास युवा पीढ़ी के लिए जो कि इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं। MyGov उस पर मैंने 3 eBooks रखी है। एक eBooks है स्वच्छ भारत की प्रेरक घटनाओं को लेकर के, सांसदों के आदर्श ग्राम के संबंध में और हेल्थ सेक्टर के संबंध में, स्वास्थ्य के संबंध में। मैं आपसे आग्रह करता हूँ आप इसको देखिये। देखिये इतना ही नहीं औरों को भी दिखाइये इसको पढ़िए और हो सकता है आपको कोई ऐसी बातें जोड़ने का मन कर जाए। तो ज़रूर आप ‘MyGov.in’ को भेज दीजिये। ऐसी बातें ऐसी होती है कि बहुत जल्द हमारे ध्यान में नहीं आती है लेकिन समाज की तो वही सही ताकत होती है। सकारात्मक शक्ति ही सबसे बड़ी ऊर्जा होती है। आप भी अच्छी घटनाओं को शेयर करें। इन eBooks को शेयर करें। eBooks पर चर्चा करें और अगर कोई उत्साही नौजवान इन्हीं eBooks को लेकर के अड़ोस-पड़ोस के स्कूलों में जाकर के आठवीं, नोवीं, दसवीं कक्षा के बच्चों को बतायें कि देखों भाई ऐसा यहाँ हुआ ऐसा वहाँ हुआ। तो आप सच्चे अर्थ में एक समाज शिक्षक बन सकते है। मैं आपको निमंत्रण देता हूँ आइये राष्ट्र निर्माण में आप भी जुड़ जाइये।

मेरे प्यारे देशवासियों, पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन से चिंतित है। climate change, global warming, डगर-डगर पर उसकी चर्चा भी है चिंता भी है और हर काम को अब करने से पहले एक मानक के रूप में इसको स्वीकृति मिलती जा रही है। पृथ्वी का तापमान अब बढ़ना नहीं चाहिए। ये हर किसी की ज़िम्मेवारी भी है चिंता भी है। और तापमान से बचने का एक सबसे पहला रास्ता है, ऊर्जा की बचत “energy conservation” 14 दिसम्बर “National Energy Conservation Day” है। सरकार की तरफ़ से कई योजनायें चल रही हैं। L.E.D बल्ब की योजना चल रही है। मैंने एक बार कहा था कि पूर्णिमा की रात को street lights बंद करके अँधेरा करके घंटे भर पूर्ण चाँद की रोशनी में नहाना चाहिए। उस चाँद की रोशनी का अनुभव करना चाहिए। एक किसी मित्र ने मुझे एक link भेजा था देखने के लिए और मुझे उसको देखने का अवसर मिला, तो मन कर गया कि मैं आपको भी ये बात बताऊँ। वैसे इसकी credit तो Zee News को जाती है। क्योंकि वो link Zee News का था। कानपुर में नूरजहाँ करके एक महिला TV पर से लगता नहीं है कोई उसको ज्यादा पढ़ने का सौभाग्य मिला होगा।लेकिन एक ऐसा काम वो कर रही हैं जो शायद किसी ने सोचा ही नहीं होगा। वह solar ऊर्जा से सूर्य शक्ति का उपयोग करते हुए ग़रीबों को रोशनी देने का काम कर रही है। वह अंधेरे से जंग लड़ रही है और अपने नाम को रोशन कर रही है। उसने महिलाओं की एक समिति बनाई है और solar ऊर्जा से चलने वाली लालटेन उसका एक plant लगाया है और महीने के 100/- रू. के किराये से वो लालटेन देती है। लोग शाम को लालटेन ले जाते हैं, सुबह आकर के फिर charging के लिए दे जाते हैं और बहुत बड़ी मात्रा में करीब मैंने सुना है कि 500 घरों में लोग आते हैं लालटेन ले जाते हैं। रोज का करीब 3-4 रू. का खर्च होता है लेकिन पूरे घर में रोशनी रहती है और ये नूरजहाँ उस plant में solar energy से ये लालटेन को recharge करने का दिनभर काम करती रहती है। अब देखिये जलवायु परिवर्तन के लिए विश्व के बड़े-बड़े लोग क्या-क्या करते होंगे लेकिन एक नूरजहाँ शायद हर किसी को प्रेरणा दे, ऐसा काम कर रही है। और वैसे भी, नूरजहाँ को तो मतलब ही है संसार को रोशन करना। इस काम के द्वारा रोशनी फैला रही हैं। मैं नूरजहाँ को बधाई देता हूँ और मैं Zee TV को भी बधाई देता हूँ क्योंकि उन्होंने कानपुर के एक छोटे से कोने में चल रहा इस काम देश और दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दिया। बहुत-बहुत बधाई।

मुझे उत्तर प्रदेश के श्रीमान अभिषेक कुमार पाण्डे ने एक फ़ोन किया है “जी नमस्कार मैं अभिषेक कुमार पाण्डे बोल रहा हूँ गोरखपुर से बतौर entrepreneur मैं आज यहाँ working हूँ, प्रधानमन्त्री जी को मैं बहुत ही बधाइयाँ देना चाहूँगा कि उन्होंने एक कार्यक्रम शुरू किया MUDRA Bank, हम प्रधानमंत्री जी से जानना चाहेंगे कि जो भी ये MUDRA Bank चल रहा है इसमें किस तरह से हम जैसे entrepreneurs उधमियों को support किया जा रहा है? सहयोग किया जा रहा है?” अभिषेक जी धन्यवाद। गोरखपुर से आपने जो मुझे सन्देश भेजा। प्रधानमंत्री MUDRA योजना fund the unfunded। जिसको धनराशि नहीं मिलती है उनको धनराशि मिले। और मकसद है अगर मैं सरल भाषा में समझाऊं तो “3 तीन E, Enterprises, Earning, Empowerment. मुद्रा enterprise को encourage कर रहा है, मुद्रा earning के अवसर पैदा करता है और मुद्रा सच्चे अर्थ में empower करता है। छोटे-छोटे उद्यमियों को मदद करने के लिए ये MUDRA योजना चल रही है। वैसे मैं जिस गति से जाना चाहता हूँ वो गति तो अभी आनी बाकी है। लेकिन शुरुआत अच्छी हुई है इतने कम समय में क़रीब 66 लाख़ लोगों को 42 हज़ार करोड़ रूपया प्रधानमंत्री MUDRA योजना से उन लोगों को मिला। धोबी हो, नाई हो, अख़बार बेचनेवाला हो, दूध बेचनेवाला हो। छोटे-छोटे कारोबार करने वाले लोग और मुझे तो ख़ुशी इस बात की हुई कि क़रीब इन 66 लाख़ में 24 लाख़ महिलाए है। और ज़्यादातर ये मदद पाने वाले SC, ST, OBC इस वर्ग के लोग हैं जो खुद मेहनत करके अपने पैरों पर सम्मान से परिवार को चलाने का प्रयास करते हैं। अभिषेक ने तो खुद ने अपने उत्साह की बात बताई है। मेरे पास भी काफ़ी कुछ ख़बरें आती रहती हैं। मुझे अभी किसी ने बताया कि मुंबई में कोई शैलेश भोसले करके हैं। उन्होंने MUDRA योजना के तहत बैंक से उनको साढ़े आठ लाख रुपयों का क़र्ज़ मिला। और उन्होंने sewage dress, सफाई का business शुरू किया। मैंने अपने स्वच्छता अभियान के समय संबंध में कहा था कि स्वच्छता अभियान ऐसा है के जो नए entrepreneur तैयार करेगा। और शैलेश भोसले ने कर दिखाया। वे एक टैंकर लाये हैं उस काम को कर रहे है और मुझे बताया गया कि इतने कम समय में 2 लाख़ रूपए तो उन्होंने बैंक को वापिस भी कर दिया। आखिरकार हमारा MUDRA योजना के तहत ये ही इरादा है। मुझे भोपाल की ममता शर्मा के विषय में किसी ने बताया कि उसको ये प्रधानमंत्री MUDRA योजना से बैंक से 40 हज़ार रूपए मिले। वो बटुवा बनाने का काम कर रही है। और बटुवा बनाती है लेकिन पहले वो ज़्यादा ब्याज़ से पैसे लाती थी और बड़ी मुश्किल से कारोबार को चलती थी। अब उसको अच्छी मात्रा में एक साथ रूपया हाथ आने के कारण उसने अपने काम को आधिक अच्छा बना दिया। और पहले जो अतिरिक्त ब्याज़ के कारण और, और कारणों से उसको जो अधिक खर्चा होता था इन दिनों ये पैसे उसके हाथ में आने के कारण हर महिना क़रीब-क़रीब एक हज़ार रूपए ज़्यादा बचने लग गया। और उनके परिवार को एक अच्छा व्यवसाय भी धीरे-धीरे पनपने लग गया। लेकिन मैं चाहूँगा कि योजना का और प्रचार हो। हमारी सभी बैंक और ज़्यादा संवेदनशील हों और ज़्यादा से ज़्यादा छोटे लोगों को मदद करें। सचमुच में देश की economy को यही लोग चलाते हैं। छोटा-छोटा काम करने वाले लोग ही देश के अर्थ का आर्थिक शक्ति होते हैं। हम उसी को बल देना चाहतें है। अच्छा हुआ है, लेकिन और अच्छा करना है।

मेरे प्यारे देशवासियो, 31 अक्टूबर सरदार पटेल की जयंती के दिन मैंने “एक भारत-श्रेष्ठ भारत की चर्चा की थी। ये चीज़े होती है जो समाज जीवन में निरंतर जागरूकता बनी रहनी चाहिये। राष्ट्र्याम जाग्रयाम व्यम “Internal vigilance is the prize of liberty” देश की एकता ये संस्कार सरिता चलती रहनी चाहिये। “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” इसको मैं एक योजना का रूप देना चाहता हूँ। MyGov उस पर सुझाव माँगे थे। Programme का structure कैसा हो? लोगो क्या हो? जन-भागीदारी कैसे बढ़े? क्या रूप हो? सारे सुझाव के लिए मैंने कहा था। मुझे बताया गया कि काफ़ी सुझाव आ रहे हैं। लेकिन मैं और अधिक सुझाव की अपेक्षा करता हूँ। बहुत specific scheme की अपेक्षा करता हूँ। और मुझे बताया गया है कि इसमें हिस्सा लेने वालों को certificate मिलने वाला है। कोई बड़े-बड़े prizes भी घोषित किये गए हैं। आप भी अपना creative mind लगाइए। एकता अखंडता के इस मन्त्र को ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ इस मन्त्र को एक-एक हिन्दुस्तानी को जोड़ने वाला कैसे बना सकते हैं। कैसी योजना हो, कैसा कार्यक्रम हो। जानदार भी हो, शानदार भी हो, प्राणवान भी हो और हर किसी को जोड़ने के लिए सहज सरल हो। सरकार क्या करे? समाज क्या करे? Civil Society क्या करे? बहुत सी बातें हो सकती हैं। मुझे विश्वास है कि आपके सुझाव ज़रूर काम आयेंगे।

मेरे प्यारे भाइयो-बहनो, ठण्ड का मौसम शुरू हो रहा है लेकिन ठण्ड में खाने का तो मज़ा आता ही आता है। कपड़े पहनने का मज़ा आता है, लेकिन मेरा आग्रह रहेगा व्यायाम कीजिये। मेरा आग्रह रहेगा शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए ज़रूर कुछ न कुछ समय ये अच्छे मौसम का उपयोग व्यायाम-योग उसके लिए ज़रूर करेंगे। और परिवार में ही माहौल बनाये, परिवार का एक उत्सव ही हो, एक घंटा सब मिल करके यही करना है। आप देखिये कैसी चेतना आ जाती है।और पूरे दिनभर शरीर कितना साथ देता है। तो अच्छा मौसम है, तो अच्छी आदत भी हो जाए। मेरे प्यारे देशवासियो को फिर एक बार बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

जयहिन्द।

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